जेण्डर सशक्तिकरण की समझ

जेण्डर सशक्तिकरण की समझ कैसे विकसित करेंगे ?

अथवा, जेण्डर विभेदों की समाप्ति के उपायों का विस्तारपूर्वक वर्णन करें।

अथवा, जेण्डर सशक्तिकरण से आपका क्या तात्पर्य है और यह क्यों जरूरी है? उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

अथवा, जेण्डर सशक्तिकरण से आप क्या समझते हैं? भारतीय समाज में जेण्डर सशक्तिकरण कैसे संभव है? चर्चा करें।

जेण्डर विभेदीकरण के कारण हमारे देश में स्त्री-पुरुष अनुपात की खाई निरन्तर बढ़ती जा रही है। हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में यह स्थिति और भी खतरनाक स्थिति में पहुँच गई है। बालक और बालिकाओं में इस तरह के विभेदों से देश की पूर्णरूपेण प्रगति संभव नहीं है। कई तरह के सरकारी और स्वयंसेवी संस्थानों के प्रयास से जेण्डर विभेदीकरण को समाप्त करने के प्रयास किये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाये जा रहे ‘प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना’ एक महत्त्वाकांक्षी योजना है जो जेण्डर पक्षपात को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। विभिन्न राज्य सरकार भी दिशा में प्रयत्नशील हैं। प्रसव पूर्व लिंग निषेध (विनिमय एवं दुरुपयोग) अधिनियम(पी.एन.डी.टी. एक्ट) जो कि कानूनी प्रावधान है, इसे सख्ती से लागू करने की जरूरतें है। भारतीय समाज में जेण्डर विभेदीकरण यहाँ की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना का हीएक परिणाम है जिसका समाधान भी सामाजिक सांस्कृतिक संरचना के अनुसार ही खोजना होगा। जेण्डर विभेदों की समाप्ति के निम्नलिखित उपाय अपनाये जा सकते हैं

1. भ्रूण हत्या रोकने हेतु अधिनियमों को सख्ती से पालन – पी.एन.डी.टी. एक्ट एवं अधिनियमों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। इसके लिए एक जन-आन्दोलन खड़ा करने की जरूरत है जिससे सम्बन्धित चिकित्सालयों एवं चिकित्सकों तथा दोषी माता-पिता को कठोर-से-कठोर सजा दिलायी जायें और जुर्माना लगाकर दण्डित किया जाये जिससे दूसरे लोग भी कन्या भ्रूण हत्या जैसे नृशंस अपराध को करने के पहले बारम्बार सोचें। इसके लिए आवश्यक है कि छोटे-छोटे कस्बों से लेकर राजधानियों एवं महानगरों में फल-फूल रहे ऐसे अस्पतालों एवं निजी क्लीनिकों को चिह्नित किया जाये, उन पर नजर रखकर दोषियों को कड़ी-से-कड़ी सजा दी जाये। इसके लिए NGOs एवं आम आदमी को भी आगे आने की जरूरत है जिससे इस हृदयहीन अपराध को तिरोहित किया जा सके।

2. शिक्षा का प्रचार-प्रसार – आम जनता तक शिक्षा का अलख जगाकर ही स्त्री-पुरुष के विभेदीकरण को खत्म किया जा सकता है। आम जनता के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार करके ही बालक-बालिकाओं के लिंग को लेकर जो पक्षपात का वातावरण है, उसे दूर किया जा सकता है। शिक्षा के ही माध्यम से यह धारणा बदली जा सकती है कि लड़कियाँ सिर्फ घर के चहारदीवारी तक ही सीमित हैं। शिक्षा हमारे सोच को विस्तृत और व्यापक बनाती है जिससे हम लड़कियों के प्रति बने हुए पूर्वधारणाओं को बदल सकते हैं। शिक्षा ही यह बात हृदयंगम करा सकती है कि लड़का-लड़की मायने नहीं रखता है, बल्कि व्यक्ति केकार्य महत्त्वपूर्ण होते हैं।

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शिक्षा से ही समाज में जागृति आती है प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, पेपर मीडिया आदि के माध्यम से घटते हुए लिंगानुपात और इसके दुष्प्रभावों से समाज को अवगत कराया जा सकता है। घटते हुए लिंगानुपात से विवाह हेतु कन्या नहीं मिलेगी। इससे परिवार अपूर्ण होगा तथा समाज में प्रेम, दया, त्याग, सहानुभूति के गुणों में भी कमी आ जायेगी। समाज में व्याभिचार, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति आदि दुर्गुणों में वृद्धि होगी। स्त्री के नहीं रहने से पुरुष महत्त्वहीन हो जायेंगे स्त्री के नहीं रहने से बेटी, बहू, पत्नी, माता, बहन की कल्पना भी हमलोग नहीं कर सकते हैं उपर्युक्त दुष्परिणामों से समाज को बारम्बार अवगत कराकर हम जेण्डर विभेदों को कम कर सकते हैं।

3. चुस्त-दुरुस्त कानून का राज स्थापित करके – यदि समाज में बलात्कार, छींटाकशी, एसिड फेंकने, व्याभिचार जैसी घटनाएँ बलवती होती हैं तो माता-पिता पुत्री की चाह नहीं रखते हैं, उनमें विभिन्न तरह की असुरक्षा की भावना घर कर जाती हैं। समाज में यदि पुलिस तथा प्रशासन चुस्त-दुरूस्त कानून का राज रखेंगे तो स्त्रियों के साथ होनेवाले व्याभिचारों की संख्या में कमी आयेगी, लोग इस तरह का अपराध करने के पहले हजार बार सोचेगे। माता-पिता को असुरक्षा की भावना नहीं होगी और वे कन्या संतान से पीछे नहीं हटेंगे। अतः समाज में कानून का राज व्यवस्थित कर असुरक्षा की भावना को दूर किया जा सकता है। सख्त कानून के राज से चिकित्सालयों में हो रहे लिंग-परीक्षण पर भी पाबन्दी लगायी जा सकती है जिससे जेण्डर विभेदों की समाप्ति की जा सकती है।

4. धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं पर रोक – हमारे समाज में विभिन्न तरह की धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएँ हैं जिससे जेण्डर विभेदीकरण को काफी बल मिलता है। जन आंदोलन खड़ा करके समाज एवं परिवार में बालकों के विकल्प के रूप में बालिकाओं को खड़ा किया जाना चाहिए। अभी हाल ही में बिहार के गया जिले में पिता की अन्तेष्टि कार्य एवं मुखाग्नि का कार्य बेटियों ने ही किया क्योंकि उन्हें कोई बेटा नहीं था। बालिकाएँ भी भगवान की बनायी अद्वितीय कृति है और वे हरेक मामले में पुरुषों के बराबर हैं। बालिकाएँ प्रत्येक कार्य तथा संस्कार को सम्पादन करने में सक्षम हैं, उन्हें किसी भी कार्य से अलग नहीं किया जा सकता। पर्दा प्रथा, बाल-विवाह, विधवा विवाह निषेध, डायन प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या पर पूरी रोक लगायी जानी चाहिए। शारदा एक्ट को प्रभावी बनाकर बाल-विवाह पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। 18 वर्ष से कम उम्र में बालिकाओं के विवाह को प्रभावकारी ढंग से रोका जाना चाहिए। विधवा विवाह को प्रोत्साहित किये जाने की जरूरत है। इसके लिए सरकारी, गैर सरकारी संस्थाएँ तथा आम जन को आगे आना होगा तभी जेण्डर विभेद को खत्म किया जा सकता है।

5. बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाकर – जेण्डर विभेदीकरण को समाप्त करने के लिए सभी राजनीतिक पाटियों को आम राय बनाकर 50% महिला आरक्षण बिल पास करने की जरूरत है। कुछ राज्यों ने स्थानीय निकाय चुनावों में 50% आरक्षण महिलाओं के लिए लागू किया है, इसे पूरे देश में लागू करने की जरूरत है। सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में भी आधा सीट महिलाओं के लिए सुरक्षित करने की जरूरत है। जाति आधारित आरक्षण से ज्यादा जरूरत है कि महिलाओं के लिए ज्यादा-से-ज्यादा आरक्षण प्रदान किया जाये। बालिकाओं के आत्मनिर्भरता हेतु रोजगारपरक व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की नि:शुल्क व्यवस्था की जानी चाहिए। महिलाओं के आवश्यकता एवं अभिरुचि के अनुसार व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जानी चाहिए। आर्थिक स्वालम्बन महिला तथा पुरुषों के मध्य लिंग भेद समापन में मुख्य भूमिका का निर्वहन करता है और यह व्यावसायिक शिक्षा द्वारा ही सम्भव बनाया जा सकता है।

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6. शिक्षा प्रणाली में सुधार – वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बालिकाओं के वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ा जाना चाहिए। बालिकाओं की आवश्यकताओं तथा अभिरुचियों के अनुसार पाठ्यचर्या का निर्माण किया जाना चाहिए। शिक्षा विभाग में महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर होनी चाहिए। महिलाओं के लिए व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए। विभिन्न तरह के कौशलों का निर्माण किया जाना चाहिए, जो बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनानेवाला हो। बालिकाओं में अपव्यय तथा अवरोधन के कारणों की पहचान कर उसको रोकने का भरसक प्रयास किया जाना चाहिए। बालिकाओं के लिए अलग छात्रावासों की समुचित व्यवस्था किया जाना चाहिए। उपर्युक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप जेण्डर विभेदों को समाप्त किया जा सकता है।

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